क्रिकेट के खेल मे नबंर तीन पर बल्लेबाजी करना हमेशा
चुनौतिपूर्ण रहता है। चाहे टेस्ट हो,एकदिवसीय हो या आजकल सबसे ज्यादा मशहूर
होता टी-20। अगर आप क्रिकेट के इतिहास को देखे तो पायेंगे के नबंर तीन पर खेलने
वाले बल्लेबाजो ने अपने टीम के लिये हमेशा अहम योगदान दिया है। कभी नबंर तीन के
बल्लेबाज को शुरुवाती ओवर्स मे ही मैदान पर बल्लेबाज़ी करने आना होता है। तो कभी
शुरुवाती बल्लेबाजो द्वारा दी गई अच्छी शुरुवात को आगे बढाने मे मदद करना होता है।
जब भी नबंर तीन बल्लेबाज पिच पर आता है,तो उसके लिये हर बार अलग-अलग परिस्थिती होती है।

अपने करियर मे अधिकतर नबंर तीन पर खेलने वाले कुछ बल्लेबाजो ने तो
क्रिकेट के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख दिया है। अपनी टीम को
मुश्किल परिस्थिती से निकालने मे उनका योगदान हमेशा रहा है। दुनिया के सबसे महान
बल्लेबाज़ “सर डान ब्रेडमैन“ भी नबंर तीन पर खेला
करते थे। उन्होने अपने करियर मे खेले 52 टेस्ट मे से 40 टेस्ट मैच मे नबंर तीन पर
बल्लेबाजी की है। जिसमे उन्होने 103.63 की औसत से 5078 रन बनाये है।
भारत की ओर से राहुल द्रविड ने हमेशा से नबंर तीन पर शानदार
पारीया खेली है। जब भी भारत को नबंर तीन पर एक ठोस पारी की जरुरत होती थी, द्रविड पिच पर दीवार
की तरह जम जाते थे। जब भी पहला विकेट जल्दी गिर जाता है, तो नबंर तीन के
बल्लेबाज़ से ये उम्मीद की जाती है की वो पिच पर रुककर खेले और कुछ देर रक्षात्मक
स्ट्रोक खेले, अधिकतर बल्लेबाज़ इसी प्रथा को मानते है।
परंतु 15 फरवरी 1995
को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट एक ऐसा बल्लेबाज़ आया जिसमे इस प्रथा को बदलने की क्षमता
थी। अपने पहले एकदिवसीय मुकाबले मे उसने सिर्फ 1 रन बनाया था। परंतु अपने पहले ही टेस्ट
मे शानदार 96 रन की पारी खेलकर आने वाले एक सुनहरे कल का आगाज़ कर दिया था।
आस्ट्रेलिया के इस बल्लेबाज़ ने बल्लेबाज़ी को एक नये आयाम दिये
और दुनिया इन्हे पंटर के नाम से जानती है।
रिकी थामस पोंटिंग,जी हा आस्ट्रेलिया के इस महान बल्लेबाज़
ने नबंर तीन पर अपने ही तरीके से बल्लेबाज़ी की और क्रिकेट जगत को नबंर तीन पर
खेलने का एक नायाब तरीका सिखाया।
19 दिसबंर 1974 को जन्मे पोंटिंग ने सन 1995 मे साऊथ अफ्रीका
के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपना डेब्यू किया और उसी साल श्रीलंका के खिलाफ अपने
टेस्ट करियर का आगाज़ भी किया था। आक्रमक अंदाज़ मे खेलने वाले पोंटिंग का शुरुवाती
करियर स्थिर नही रहा। सन 1999 से पहले कई बार वो टीम से अंदर – बाहर होते रहे। सन 1999 से उन्होने अपनी
खोयी हुई लय फिर से प्राप्त की और उसके बाद उन्होने कभी पिछे मुडकर नही देखा।
सन 2002 मे वो
आस्ट्रेलिया की एकदिवसीय टीम के कप्तान बन गये और 2003 मे उन्होने
आस्ट्रेलिया की झोली मे तीसरा विश्व कप डाल दिया। उन्होने फाईनल मे भारत के खिलाफ
ताबडतोड बल्लेबाज़ी की, उन्होने इस पारी मे 8 बार गेंद को बिना
टप्पा खिलाये सीमा रेखा के पार किया और सिर्फ 121 गेंदो पर नाबाद 140 रन बनाकर
वर्ल्ड कप 2003 विजेता के रूप मे आस्ट्रेलिया का नाम लिख दिया।
जिस तरह से हर टीम भारत की लम्बी बल्लेबाज़ी लाईन के कारण
परेशान होती है। ठीक उसी तरह से दुसरी टीमे आस्ट्रेलिया के ओपनर्स को जल्दी आऊट
करने के बाद भी खुश नही होती है, क्योंकी पोंटिंग
क्रिज़ पर आते ही सारा दबाव हटा देते थे।
रिकी पोंटिंग सिर्फ एक आक्रमक बल्लेबाज़ ही नही थे, साथ ही वो आक्रमक
कप्तान भी थे। उनकी कप्तानी मे आस्ट्रेलिया ने लगातार दो विश्व कप जीते है। साथ ही
वो आस्ट्रेलिया के सबसे सफल कप्तान भी है। कप्तानी और बल्लेबाज़ी के अलावा पोंटिंग
एक शानदार क्षेत्ररक्षक भी है। शार्ट लेग और सिली पाईंट पर उन्होने अदभूत कैच पकडे
है। स्लिप कैचिंग मे तो वो हमेशा कमाल करते थे।
उन्होने टेस्ट क्रिकेट मे 195
कैच
और एकदिवसीय क्रिकेट मे 160
कैच
पकडे है।
पोंटिंग हमेशा आक्रमक अंदाज़ मे खेलते थे। चाहे फिर वो बल्लेबाज़ी
करे, कप्तानी करे या
क्ष्रेत्ररक्षण करे। इसी आक्रमक अंदाज़ के चलते उनका विवादो से भी गहरा रिश्ता रहा
है। भारत दौरे पर कलकत्ता(अब कोलकाता ) के बार मे महिलाओ को छेडने का विवाद हो, सिडनी टेस्ट मे भारत
की दुसरी पारी मे गांगुली का आऊट का निर्णय देने की बात हो या उसी टेस्ट मे जमीन
पर गेंद लगने के बाद भी आऊट की अपील करना हो। पोंटिंग किसी भी तरह जीतने मे
विश्वास रखते थे। चाहे फिर इसके लिये उन्हे बेईमानी ही क्यो ना करनी पडे।
आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी “कोकाबुरा कहुना स्पोर्ट्स“ ने बल्लो की साईड मे
लकडी की जगह ग्रेफाईट का प्रयोग किया था। इस बल्ले का प्रयोग पोंटिंग के साथ जयसूर्या,जस्टिन लैगर और नथल एस्टल भी करते थे।
पोंटिंग ने सन 2004 के अंत से इस बल्ले का उपयोग शुरु किया था और 12 महीने मे
उन्होने इस बल्ले से खेलते हुये 67.13 की औसत से टेस्ट मे 1544 रन और एकदिवसीय
क्रिकेट मे 1137 बनाये थे। सन 2006 की शुरुवात मे अपने 100वे टेस्ट की दोनो पारीयो
मे शतक लगा कर एक रिकार्ड भी बनाया था। इस दौरान वो टेस्ट मे नबंर 1 और एकदिवसीय
क्रिकेट मे नबंर 2 की उपाधि भी प्राप्त कर चुके थे। फरवरी 2006 से आई.सी.सी ने इस
बल्ले के प्रयोग पर रोक लगा दी है।
अपने पहले भारत दौरे पर पोंटिंग कलकत्ता के ईक्यूनोक्स नाईट
क्लब मे महिलाओ को छेडने का आरोप भी लगा था। इसके कारण पोंटिंग पर $1000 डालर का जुर्माना भी
लगा था। बाद मे पोंटिंग ने माफी भी मांगी थी परंतु छेडछाड की बात से वो मुकर गये
थे। पोंटिंग जब खेलते थे तो विपक्षी खिलाडियो से भी भिड जाते थे। उन्होने साईमंड्स
को टेस्ट टीम मे लाने की भी वकालत की थी। बाद मे साईमंडस को अपने खराब व्यवहार के
कारण टीम से निकाल दिया गया था।
भारत के खिलाफ मे सिडनी टेस्ट मे भी उनका व्यवहार खराब रहा था। जिसके चलते उनकी काफी
आलोचना भी हुई थी। पोंटिंग ने उस मैच मे
भी हरभजन – साईमंड्स विवाद मे
साईमंड्स का साथ दिया था। गांगुली के आऊट होने पर अपांयर मार्क बेंसन को उन्होने
आऊट का इशारा किया था।
अपंयार
ने भी उनकी बात मानते हुये गांगुली को आऊट दे दिया, परंतु बाद मे टी.वी
रिपले मे साफ दिख रहा था के गेंद जमीन को छू गई थी।
छोटे कद के पोंटिंग का फुटवर्क काफी शानदार था। फ्रंट फुट पर
आकर वो बहुत ही शानदार ड्राईव करते थे। जब गेंदबाज़ शार्ट गेंद फेकते है और
बल्लेबाज़ फ्रंट फुट पर हो तो उस वक़्त बल्लेबाज़ के लिये शाट खेलने मे मुश्किल होती
है। परंतु पोंटिंग फ्रंट फुट से भी पुल मार देते थे। हरभजन सिह के अलावा उन्हे
दुनिया मे किसी भी गेंदबाज़ ने ज्यादा परेशान नही किया, ये बात उन्होने खुद
संयास के बाद कही है।
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साऊथ अफ्रिका के खिलाफ पर्थ मे हुये सिरीज के आखिरी टेस्ट के
बाद पोंटिंग ने अपने क्रिकेट करियर को अंत करने का फैसला किया ,अंतरराष्ट्रिय
क्रिकेट मे ये उनका आखरी मैच था। इस मैच मे वो कुछ कमाल नही कर पाये। पर्थ से
उन्होने अपने टेस्ट करियर का आगाज़ किया था और उन्होने इसी मैदान पर अपने इस सफर का
अंत भी कर दिया है।
पोंटिंग ने 168 टेस्ट मैच मे 51.85 की औसत से 13378 रन बनाये
है। जिसमे 41 शतक और 62 अर्धशतक शामिल है। उनका सर्वोच स्कोर 257 रन का रहा है।
एकदिवसीय क्रिकेट मे उन्होने 375 मैच मे 42.03 की औसत से 13704 रन बनाये है। जिसमे
30 शतक और 82 अर्धशतक शामिल है। उनका सर्वोच 164 रन का स्कोर रहा है।
पोंटिंग ने 2008 मे आई.पी.एल मे कोलकाता नाईट राईडर्स की टीम
से शिरकत की थी। परंतु उन्हे आई.पी.एल से ज्यादा अहमियत अपने देश के लिये क्रिकेट
खेलने को दी थी।
पोंटिंग को हमेशा खेलभावना का उलंघन करने के कारण आलोचनाओ का
सामना करना पडा। खासकर भारत के दर्शको ने उन्हे सिडनी टेस्ट विवाद के बाद एक विलेन
की तरह ही देखा है। परन्तु युवा खिलाडीयो को
उनसे सिखना चाहिये के वो किस तरह से कप्तानी,बल्लेबाजी और फिल्डिंग करते थे और तीनो
क्षेत्र मे हमेशा लाजवाब रहे थे। पोंटिंग़ ने हमेशा सचिन तेंडुलकर को कडी प्रतिस्पर्धा
दी, परंतु उन्होने खुद संयास के बाद कहा के
सचिन दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज़ है। मैं हमेशा दुसरे नबंर पर रहे है।
पोंटिंग एक अच्छे खिलाडी नही है,परंतु वो एक बेहतरीन
बल्लेबाज है।
लेख - चिराग जोशी उज्जैन (म.प्र)
Chiragrocks31@gmail.com