ईश्वर की कला, मानव का विनाश

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कला कहने को सिर्फ़ एक शब्द ही तो है पर अर्थ इतना व्यापक कि इसके बिना तो जैसे जीवन की कल्पना ही नही की जा सकती। जीवन कला बिना ऐसा लगता मानो प्रकृति के सृजनकर्ता ने जीवन रूपी पुष्प मे कोई रंग ही ना भरा हो।
कला की परिभाषा कहने को विद्वानों को बोलें तो वे ना जाने कितने रूप मे कला को परिभाषित कर दें। पर मेरे विचार मे कार्य मे आत्मा का समागम ही कला है। कला को प्रदर्शित करने के लिए दिमाग़ की आव्यशकता नही होती। यहाँ केवल हृदय की अनुभूति की आव्यशकता है।
कवि, लेखक, चित्रकार, नृत्यकार ये सभी अपनी - अपनी कलाओं से जीवन को तरह - तरह के रंगों से भर देते हैं।
जब एक लेखक अपने विचारों को कागज पर उतारता है तो उसे किसी दिमाग़ की आव्यशकता नही होती है', आव्यशकता होती है तो केवल भाव की । जिसके द्वारा वह अपनी हृदय की धड़कानों को विचारों की कलम द्वारा कागज पर बड़ा ही सुंदर रूप प्रदान करता है ।

उसी तरह एक नृत्यांगना अपने कदमो की ताल को अपने दिल की धड़कन से मिलाकर सबका मन मोह लेती है । चित्रकार अपनी चित्रकारी से ना जाने कैसे कैसे भावों को प्रकट कर देता है ।

गायक अपने सरगम को सुरों मे ढ़ालकर ना जाने कितने भावों को ध्वनियों मे समेटे हुए गायन के रूप मे प्रकट करते हैं।
परन्तु जब बात आती है ईस्वर की कलाकारी की तो लगता है, हाँ वाकई उससे बड़ा कलाकार तो कोई है ही नही । वही तो है कलाकारों का कलाकार।
ईश्वर ने इस पूरी सृष्टि को कितने सुंदर-२ रंगो से नवाजा है प्रक्रति में वितरित ये तमाम रंग केवल परोपकार, दया, कृपा, ममता जैसे भावों को ही दिखाते हैं। जो सृजन का प्रतीक है, प्रेम का उदगम है, भावों का सागर है, ममता का भंडार है।
भगवान के सृजन के आगे मानव के निर्मित अविष्कार कभी -२ विध्वंस की ओर ले जाते लगते हैं । मानव के अविष्कार कभी- कभी क्रूरता को प्रकट करते हैं।
खुले गगन मे अपने परों को फैलाकर उड़ते हुए ईश्वर के द्वारा सृजित पक्षी कितने आज़ाद लगते हैं पर बदले में इंसान ने बनाया पिंजरा ओर क़ैद। जिसमे पक्षी अपने पखों को फड़फड़ाकार केवल आज़ादी की गुहार लगाता है। पता नही आप इसे मानव का प्रेम कहेगें या क्रूरता, पर मैं इसे प्रेम की संगया नही दे सकती।
ईश्वर ने अपने प्रेम का प्रदर्शन पशुओं को बनाकर किया जो जीते जी मानव को कितना लाभ पहुँचाते हैं । कोई सामान धोता है तो कोई स्वयं  मानव को ढोता है । कोई हमे दूध, मख्खन, मिष्ठान से भरपूर करता है तो कोई ना जाने कितने ही अन्य तरीकों से। पर मानव की कलाकृति के क्या कहने ! उसने इसी के माँस से बनाया चमड़ा और किसी ने अपने पेट का आहार । ईश्वर ने तरह -२ की फसल बनाई, मेवा, दूध, घी, अन्न-धन सब कुछ पैदा किया पर मानव ने बनाया माँस । यहाँ तक जब ईश्वर ने बनाया मानव, जो उसकी कलाकृतियों मे सर्वश्रेष्ठ कही जाती है तो बदले मे मानव ने अपने आपको भी नही बक्शा । उसने बना दी जातियाँ, धर्म, संप्रदाय ।
मानव, मानव नही रहा या तो हिंदू बना या मुसलमान । ईश्वर ने बनाया इंसान और इंसान ने बना दिए दायरे । अमीरी ग़रीबी के दायरे , धर्म के दायरे, जात के दायरे, लिंग के दायरे। और अपने ही दायरॉं मे उलझकर दुखी होता रहा मानव ।ये है वमानव की कलाकृति । ईश्वर ने बनाया खनिज  संसाधन और मानव बना बैठा अपने विनाश की कलाकृति डायनामाइड । पहले तो मानव अपने निवास की कमी पूरा करने के लिए ईश्वर निर्मित उन सुंदर वनों को काटता रहा ओर जब ग्लोबलवार्मिंग और थर्मल पल्यूशन जैसी समस्याएँ सामने आई तो वो भयाभीत होने लगा । चाहे कितनी दूर तक दृष्टि चली जाए, ईश्वर ने हर रूप मे सृजन किया है और मानव ही बना है विनाश का कारण । दोनो की कलाकृतियों मे बड़ा अंतर है उस विधाता की कृतियाँ हैं प्रेम की प्रतीक और इंसान की कृतियाँ क्रूरता का प्रतीक।
नज़रे दूर तक दौड़ा ली जाएँ तो ऐसे बहुत सारे मुद्दे हैं जैसे ग्लोबलवार्मिंग, थर्मल पल्यूशन, बढ़ता जल स्तर, नाभकीय प्रदूषण, और ना जाने कितने मुद्दे जिनमे सोचा जाए तो मानव का ही हाथ रहा है । मानव माने या ना माने लेकिन इस बात को नकारा नही जा सकता की एक ना एक दिन वो ही बनेगा विनाश का कारण।
कृपया जागें और बचा ले उस ईश्वर के उस अथाह प्रेम को ।

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