फ़िल्मे हमेशा से ही समाज का आइना रही हैं मगर आज के समय में निर्देशकों के पास तो जैसे कहानियों का अकाल सा पड़ गया है तभी तो आज जब भी दर्शक जब सिनेमा हॉल में नयी स्टोरी के लिए जाता है तो उसके हाथ सिर्फ निराशा ही लगती है। अब सवाल ये उठता है की तड़क भड़क के साथ फिल्म का प्रचार करने वाले फिल्म निर्माताओ के पास नई कहानियों का अकाल क्यों है और अगर वाकई में ऐसी बात है तो क्या उन्हें एक अच्छी खोज के बाद अपनी फिल्म का प्रस्तुतिकारण करने में कैसी झिझक है । डॉन, अग्निपथ,देवदास, शोले जैसी फिल्मो का रीमेक इस बात की पुष्टि करता है और बॉलीवुड कॉपी करने में भी पीछे नहीं रह गया है यहाँ कई सफल हॉलीवुड की कॉपी की गयी है आज के समय में लेखको के पास कहानियों की कितनी कमी है,अगर आने वाले समय में भी लेखकों ने नयी कहानिया प्रस्तुत न की तो वह समय दूर नहीं जब एक बड़ा दर्शकवर्ग सिनेमा से कट जायेगा ।क्या अब रीमेक और हॉलीवुड के भरोसे ही है हमारा बॉलीवुड ?
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फ़िल्मे हमेशा से ही समाज का आइना रही हैं मगर आज के समय में निर्देशकों के पास तो जैसे कहानियों का अकाल सा पड़ गया है तभी तो आज जब भी दर्शक जब सिनेमा हॉल में नयी स्टोरी के लिए जाता है तो उसके हाथ सिर्फ निराशा ही लगती है। अब सवाल ये उठता है की तड़क भड़क के साथ फिल्म का प्रचार करने वाले फिल्म निर्माताओ के पास नई कहानियों का अकाल क्यों है और अगर वाकई में ऐसी बात है तो क्या उन्हें एक अच्छी खोज के बाद अपनी फिल्म का प्रस्तुतिकारण करने में कैसी झिझक है । डॉन, अग्निपथ,देवदास, शोले जैसी फिल्मो का रीमेक इस बात की पुष्टि करता है और बॉलीवुड कॉपी करने में भी पीछे नहीं रह गया है यहाँ कई सफल हॉलीवुड की कॉपी की गयी है आज के समय में लेखको के पास कहानियों की कितनी कमी है,अगर आने वाले समय में भी लेखकों ने नयी कहानिया प्रस्तुत न की तो वह समय दूर नहीं जब एक बड़ा दर्शकवर्ग सिनेमा से कट जायेगा ।
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