परिवर्तन की बयार

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भारतीय जन मानस के जिस प्रकार से विचार धारों में परिवर्तन उससे तो यही लगता है की वाकई परिवर्तन लोगों के पहली पसंद बनता जा रहा है ,अपितु भारत में नही जिस प्रकार से सम्पूर्ण विश्व में जो परिवर्तन की बयार बही  उससे तो यही लगता है पूरा विश्व परिवर्तन प्रेमी है वाकई में सही कहा गया है की "परिवर्तन प्रकृति का नियम है "
परिवर्तन की बयार
 परिवर्तन दो तरीकों से  संभव है पहला तो यह है की समयानुसार किया गया  परिवर्तन और दूसरा लोगों की जरूरत के  हिसाब से किया गया परिवर्तन | परिवर्तन किसी भी प्रकार का भी हो सकता है वो फिर चाहे पुरानी रीती -रिवाज का हो या विचारों का या सत्ता परिवर्तन का या फिर कानून परिवर्तन का | हमारे देश में परिवर्तन की जो ताज़ा बयार बही वो अन्ना हजारे के नेतृत्व और बाबा रामदेव की अगुवाई में परिवर्तन की अलख सरकार के विरोध में जली है और यह परिवर्तन की बयार भारत को भ्रष्टमुक्त बनाने के लिए और और स्विस बैंक में पड़े भारतीय कालेधन को इंडिया लाने के लिए चलायी गयी है ,आज हर भारतीय के आखों में एक परिवर्तन लालसा दिखती, वर्तमान में चल रहे आन्दोलन से लोहिया ,गाँधी और भगत सिंह की याद को जीवित करता है और उनके द्वारा किये गये आन्दोलन से परिवर्तन की भी याद दिलाता है ,जहाँ अपने अधिकारों के लिए सरकार के खिलाफ मोर्चा बंदी करना और अपने हक के लिए लोगों को जागरुक कराना  और परिवर्तन की लालसा लोगों के अन्दर पैदा करना  ठीक वैसे ही है जैसे जामवंत के लिए हनुमान की शक्तिओं को स्मरण कराना है |आज सम्पूर्ण भारत परिवर्तन की मांग कर रहा क्यूंकि लोहिया के बाद आजादी के बाद का दूसरा आन्दोलन होगा जब युवाओं ने अपने हाथों में मोर्चा संभाला और सरकार की कड़ी आलोचना की है , जिससे भयभीत होकर सरकार ने अपनी चहलकदमी तेज़ कर दी है और जनता को भरोसा जितने के लिए परिवर्तन के लिए राजी मतलब जन लोकपाल बिल के समर्थन में है और इंडिया में काले धन की वापसी के लिए लोकसभा जो श्वेत पत्र जारी किये उससे तो यही लगता है सरकार की तरफ से चली गयी कछुए की चाल, जनता में  कुछ समय के लिए राहत का कार्य  करेगी पर यदि  सरकार द्वारा किया गया वादा वफ़ा न करने पर जनता एक बार अपने हाथों में परिवर्तन की मशाल लेकर एक बड़े आन्दोलन का आवाहन करेगी और अन्य देशों की भांति यहाँ भी तख्ता पलट जैसा बड़ा परिवर्तन जनता  अपने हाथों से करेगी पर वही इस परिवर्तन से जहाँ सरकार की बदनामी होगी वही यह स्वर्णिम अवसर इतिहास में जनता की  जीत के  नाम दर्ज होगा | वैसे भी  किसी बड़े गजलकार ने लिखा भी है कि-  हो गयी है पीर पर्वत सी  पिघलनी  चाहिए , इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए | सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए ...
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