फिल्म मात्र से कुछ ज्यादा है "गैंग्स ऑफ़ वासेपुर"

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  आज के समय में जहां फिल्म निर्देशक अपनी हर फिल्म को सच्चाई से दूर और कमाई करने की होड़ में लगे हुए है, वहीँ अनुराग कश्यप ने हमेशा ऐसी फिल्मे दी है जो यथार्थ के बहुत करीब रहती हैं, ऐसी ही फिल्म है हाल ही में रिलीज़ हुई अनुराग कश्यप की "गैंग्स ऑफ़ वासेपुर" जो की १९४७ से २००४ के बीच "वासेपुर" में कोयला तथा स्क्रैप ट्रेड माफिया के जंगल राज को दिखाती है.कहानी की शुरुवात होती है शहीद खान से जो वासेपुर के मशहूर डाकू "सुल्ताना" के नाम पर अंग्रेजो की ट्रेनों से अनाज लूटता है 
                     मनोज बाजपेई, सरदार खान की भूमिका में हैं जिसकी जिंदगी का एक मात्र लक्ष्य है अपने पिता के कातिल रामधीर सिंह से बदला लेना  मध्यांतर से पहले फिल्म धीमी है मगर वो कहानी की मांग है, मगर मनोरंजन की दृष्टी से दूसरा भाग काफी सफल रहा है 
                     फिल्म सच्चाई के बहुत नजदीक होने के कारण मनोरंजन से दूर हो जाती है पर निश्चय ही इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा का कद व स्तर दोनों ही कहीं न कहीं बढाया है और बहुत ही उत्क्रष्ठ्ता से विषय के साथ इन्साफ किया है, बात अगर निर्देशन की करें तो इस जिम्मेदारी को अनुराग कश्यप से अच्छी तरह से शायद कोई और नहीं निभा सकता था क्योकि जैसा की हम जानते हैं की फिल्म की अवधि लगभग ५ घंटे की है,तो यह मुमकिन था की शायद कोई और निर्देशक इसकी अवधि को कम करके इसे इतनी असरदार ढंग से प्रस्तुत न कर पाता 
                     तो अगर आप मात्र मनोरंजन के लिए अगर यह फिल्म देखने जा रहे हैं तो आप नाउम्मीद हो सकते हैं लेकिन अगर आपने बहुत समय से कोई ऐसी फिल्म नहीं देखि जो आपको जानकारी और यथार्थ से करीब ले जाये तो ये फिल्म आपको एक बेहतरीन जरिया लगेगी 
                    
          

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