एक बार जब मैंने अपने एक सज्जन और विचारशील मित्र से पूंछा की क्या वह किसी ऐसी स्त्री को अपना सकेगा जिसका भूतकाल में किसी से प्रेम सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध के स्तर पर रहा हो, तो मेरे उस मित्र ने मुझे वह जवाब दिया जिसकी आशा मैं किसी सच्चे और विचारशील व्यक्ति से कर सकता हूँ और उसका जवाब हाँ था . मगर मैंने जब उससे यह पूंछा की भविष्य में क्या वह इस बात पर पुष्टि की मोहर लगा सकता है कि क्या कभी वो बिगड़ते हुए प्रणय संबंधो में, आवेश में आकर अपनी उस जीवन साथी को उसके बीते हुए समय को लेकर कटु वचनों का प्रयोग तो नहीं करेगा तो ऐसी स्थिति में वह मुझे विश्वास दिलाने में सक्षम न हो सका तथा उसने इस बात को स्वीकारते हुए "श्री राम" का उदाहरण प्रस्तुत कर दिया जो कहीं न कहीं सटीक भी बैठता है ।
जिन "श्री राम" को हमने पुरषोत्तम की उपाधि दे रखी है उन्होंने स्वयं ही इस तरह का उदाहरण प्रस्तुत किया है की वह एक बार सोंचने पर जरूर मजबूर कर देता है कि क्या वाकई में "श्री राम" पुरषोत्तम थे क्योंकि मेरे विचार में कोई पुरुष तब तक पुरुषोत्तम नहीं हो सकता जब तक वह अपनी अर्धांग्नी को न समझ सके तथा उसके सम्मान में कोई कमी छोड़े या फिर उसे किसी तरह का कोई अघात दे. राम जी ने जिस तरह सीता जी की लंका से लौटने पर अग्निपरीक्षा ले कर अपनाया तथा फिर एक धोबी के आशंकित करने पर सीता जी का परित्याग कर दिया वह सब "श्री राम" की महान छवि से मेल खता नहीं दीखता, हालाँकि कहीं-कहीं ऐसी बातों का जिक्र भी हुआ है की सीता जी कभी लंका गयी ही नहीं तथा रावण अपने साथ "सीता माता" की परछाई मात्र ले जा सका था, परन्तु कहीं न कहीं "श्री राम" ने एक ऐसा उदाहरण तो प्रस्तुत कर दिया जो की मनुष्य के लिए हमेशा एक प्रमाण की तरह इस्तेमाल में आता रहेगा की मैं तो अपने प्रभू के पग्चिन्हों पर चल रहा हूँ ।
मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुचने का नहीं है परन्तु इतिहास में घटित इस पौराणिक घटना ने एक बात पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है की, क्या इस तरह जीवन उदाहरण प्रस्तुत करने वाले हमारे "श्री राम" सच में पुरुषोत्तम हैं ।
लेखक-वैभव सिन्हा
लेखक-वैभव सिन्हा
