"हेरोइन" फिल्म के ट्रेलर को देख कर लगता है की फिल्म में कुछ जादा ही अडल्ट सीन हैं मगर क्या वाकई में वो फिल्म की डिमांड है या फिर प्रचार का एक नया तरीका है, "डर्टी पिक्चर" के बाद तो जैसे इस तरह का प्रचार किसी भी फिल्म के लिए आम हो गया है आने वाली ऐसी फिल्मो में "क्या सुपर कूल हैं हम" भी है जो की डबल मीनिंग बाटों और अडल्ट सीन्स से भरी हुई लग रही है ।
तो सवाल अब यह उठता है की क्या सच में फिल्मे ऐसे प्रचार की मोहताज़ बन कर रह गयी है क्या फिल्म निर्माताओं को अपनी कहानी पर वह विश्वास नहीं रहा जिसके दम पर वो फिल्म को हिट करा सकें. आज के समय में मानो जैसे ये एक जरूरी चीज़ की तरह से देखा जा रहा है मानो इस तरह के प्रचार के बिना हम सफलता नहीं पा सकेंगे, फिलहाल देखना होगा की आने वाले समय में इस विचार धारा के साथ कितने निर्देशक सफल हो पाते है ।
