मनमोहन जी का भाषण या हसी की महफ़िल ?

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कल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर माननीय मनमोहन सिंह जी को लाल किला पर देश का न्यारा जान से प्यारा तिरंगा फैराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । भले ही उनहोंने इस पद और अपने धर्म की गरिमा को न समझा हो पर हम अपनी गरिमा को हमेशा की तरेह याद रखते हुए माननीय मनमोहन सिंह जी का नाम बड़ी ही इज्जत से ले रहें है । इस बात के लिए तो मनमोहन सिंह जी को मेरा शुक्रिया अदा करना चाहिए वरना भारत में घर घर में बैठा एक एक बच्चा उनके बारे में क्या क्या बोलता है कि वो खुद जाने या खुदा जाने ।
जब मनमोहन सिंह जी भारत के प्रधानमन्त्री बने तो लोगों के मन में ये आस थी कि ये एक अर्थशाष्त्री है । देश की आर्थिक स्थति में कुछ परिवर्तन जरूर होगा और परिवर्तन हुआ भी, वो बात अलग है कि अमीर और अमीर हो गया। गरीब और गरीब हो गया। बेचारा middle क्लास वाला वर्ग तो ना middle रहा, न गरीब, ना अमीर ।
कल लाल किले पर भाषण के दौरान मंत्री जी देश की उपलब्धियां गिनवाते नजर आये । हम अन्तरिक्ष पहुँच चुके है, ५१,००० नए स्कूल खुले हैं और फलां फलां.....................।
लोकपाल और काले धन के ऊपर उन्होंने चिंता का विषय कहकर दो लाइन में निपटारा कर दिया । मैदान में बैठे लोग जम्हाई लेते नजर आये । सोनिया गाँधी को देखकर तो ऐसा लगा मानो वो निरीक्षण में व्यस्त हो कि मैंने जैसा बताया वैसा ही बोल रहा है ना कहीं कोई गलती तो नहीं कर रहा । बच्चे जो बात बात पे ताली पीट रहे थे ऐसा लगा जैसे ताली पीटने के लिए ही किराए पर मंगवाए गए हो ।
हद तो तब हो गई जब वन्दे मातरम् और जय हिंद के नारों पर वो धवनी सुनाई दी कि सर ही पीट दिया हमने। अरे वन्दे मातरम् और जय हिंद के नारे तो जंतर मंतर और रामलीला मैदान में गूंजे थे जिन्हें सुनकर घर घर में बैठा जन जन का खून उबला।
कुल मिलाकर उम्मीद ही नहीं विश्वास है मुझे कि कि हर घर में बैठा आदमी केवल हस ही रहा होगा इस भाषण पर ।
वाह रे वाह माननीय मनमोहन सिंह जी कुछ भी कहो पर हमें गर्व नहीं होता आप पर ।
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