जिंदगी के अलग अलग रूप

RAFTAAR LIVE
0
जिन्दगी कभी अपनी ही सहेली लगती है ।
कभी सुलझा न सको ऐसी पहेली लगती है ।।

कभी न जाने वाला अँधेरा लगती है ।
कभी उजला हुआ सा नया सवेरा लगती है ।।

कभी खुशियों का ये रंग लगती है ।
कभी हारी हुई सी एक जंग लगती है ।।

कभी उजड़ी हुई सी एक रंगोली लगती है ।
कभी अपनी ही मुझको हमजोली लगती है ।।

कभी मुट्ठी में भरा हुआ आसमान लगती है ।
कभी काँटों से भरा हुआ जहां लगती है ।।

जवाब नहीं जिसका वो सवाल लगती है ।
कभी क़दमों से मिलती हुई ताल लगती है ।।

कभी अपने ऊपर लटकी तलवार लगती है ।
कभी बहती हुई नदी की धार लगती है ।।

कभी परियों की एक कहानी लगती है ।
कभी इश्वर की एक बेमानी लगती है ।।

क्या कहूँ किसका नाम है जिन्दगी है ।
मेरी मानो तो गुमनाम है जिन्दगी ।।

कभी खुसी बनकर हसाती है जिन्दगी ।
कभी दर्द बनकर रुलाती है जिनगी ।।

कभी सैलाब से पार आना है जिन्दगी ।
कभी बीच भवर ही डूब जाना है जिन्दगी ।।

संवर जाए तो खुदा की इनायत है जिन्दगी ।
बिगड़ जाए तो इंसान की शिकायत है जिन्दगी ।।

बचपन में खेला हुआ खेल है जिन्दगी ।
जवानी में बहुत बेमेल है जिन्दगी ।।

बुढ़ापे में जो बोझ लगे उसका नाम है जिन्दगी ।
ना चाहते हुए भी निभाना ऐसा काम है जिन्दगी ।।

खिलती हुई सी एक कली है जिन्दगी ।
कांटे भी साथ लेकर पली है जिन्दगी ।।

कोई जान न सके ऐसा राज है जिन्दगी ।
सब कुछ कहती एक खामोश आवाज है जिन्दगी ।।

 स्वाति गुप्ता
 
Tags

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)