स्वतंत्रता की लड़ाई में दो तरह की लड़ाई लड़ी गई । एक सत्य और अंहिसा के पथ पर लड़ी गई लड़ाई जो कि हमारे परम पूज्य बापू के द्वारा लड़ी गई थी । दूसरी लड़ाई जो क्रातिकारियों के द्वारा लड़ी गई लड़ाई थी वो लड़ी गई थी भगत सिंह और आजाद जैसे क्रांतिवीरों के द्वारा ।
मैं गाँधी जी द्वारा लड़ी गई लड़ाई का सम्मान करती हूँ पर ये बात किसी भी सूरते हाल में मानने के लिए तैयार नहीं कि उनकी केवल ये लड़ाई हमें पूरी आजादी दिला सकती थी । गाँधी जी ने हमेशा ही भगत सिंह की आलोचना की पर मै उनकी सभी आलोचनाओं का खंडन करती हूँ । मेरे हिसाब से अगर भगत सिंह जैसे क्रांतिवीर और लोग होते तो हमारा देश १९३० में ही आजाद हो गया होता । गाँधी जी भारत को आजाद देखना चाहते थे पर आजाद देखने और आजाद कराने में अंतर होता है । गाँधी जी के द्वारा चली जा रही लड़ाई में Down State की मांग की जा रही थी । इसका परिणाम ये होता कि हम स्वतंत्रता के नाम पर आजाद तो हो जाते पर ऊपर से हुकूमत करते अंग्रेज । भारत में पूर्ण स्वराज्य की मांग सबसे पहले भगत सिंह ने ही पेश की । जब 23 वर्ष के भगत सिंह शहीद हुए, उस वक्त गांधी जी की उम्र 62 वर्ष थी पर लोकप्रियता के मामले में भगत सिंह कहीं से कम नहीं थे । भगत सिंह की यह बढ़ती हुई लोकप्रियता कांग्रेस को एक ख़तरे की तरह दिखाई देती थी क्योंकि कांग्रेस को सुरुवात से ही केवल सत्ता ही चाहिए थी । १९१५ में जब गाँधी जी अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे , तब से वो सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत को आधी अधूरी आजादी दिलवाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे । पर वास्तविकता यही है कि भगत सिंह जैसा क्रांतिवीर अगर अपनी क्रान्ति लेकर नेशनल अस्सेम्ब्ली में न कूंदा होता तो गांधी जी की सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते चलते कमर टूट जाती पर देश को आजादी न मिल पाती । क्योंकि गांधी जी शांतिपूर्वक नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे थे जो अंग्रेज़ों के लिए काफ़ी अच्छा था, इससे उनकी व्यवस्था पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ता। भगत सिंह की फांसी के दौरान देश भर के लोगों और कांग्रेस की तरफ से गाँधी जी पर दवाब था कि गाँधी जी इरविन समझौते में फांसी न लगने कि शर्त रख दे जिससे निश्चित रूप से फांसी रूक जाती परन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया । गांधी ने इरविन समझौते में बातचीत के दौरान इरविन से केवल यह कहा था कि अगर इन युवकों की फाँसी माफ़ कर दी जाएगी तो इन्होंने मुझसे वादा किया है कि ये भविष्य में कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे । गांधी के इस कथन का भगत सिंह ने पूरी तरह से खंडन किया । असलियत तो यह थी कि भगत सिंह हर हाल में फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों । वो कतई नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता । वे यह भी जानते थे कि घंडी जी मार्ग पर चलकर आजादी नहीं मिल सकती । नाथूराम विनायक गोडसे के अनुसार गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप , झांसी की रानी व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। मेरे भगत के प्राण केवल उसकी माँ के लिए थे । भगत सिंह की फांसी जहाँ एक ओर ब्रिटिश हुकूमत और गाँधी की नैतिक हार में बदल गई । वहीं दूसरी ओर यह भगत सिंह और क्रांतिकारियों की नैतिक जीत भी बनी । देश भर में अब हजारो क्रांतिकारियों ने जनम ले लिया था , वो भी पूर्ण स्वराज्य का सपना लेकर जिसको पूरा करने का दम ख़म बब उनके पास आ चुका था और अंततः मेरे देश की आजादी का वक्त आ गया था । पर देश के आजाद होते होते गाँधी जी के मोहम्मद अली जिन्हा के बेफजूली के समर्थन से मेरे देश की माता का अंग छिन्न भिन्न हो गया । कितने ही हिन्दू मुसलमान जाति सम्प्रदाय के नाम पर बलि चढ़ गए । कई हिन्दुओं से जबरन धर्म परिवर्तन करा लिया गया ।
भारत तो आजाद हो गया पर दिल में मलाल रह गया कि काश भारत के यूँ टुकड़े न हुए होते ।
मैं गाँधी जी द्वारा लड़ी गई लड़ाई का सम्मान करती हूँ पर ये बात किसी भी सूरते हाल में मानने के लिए तैयार नहीं कि उनकी केवल ये लड़ाई हमें पूरी आजादी दिला सकती थी । गाँधी जी ने हमेशा ही भगत सिंह की आलोचना की पर मै उनकी सभी आलोचनाओं का खंडन करती हूँ । मेरे हिसाब से अगर भगत सिंह जैसे क्रांतिवीर और लोग होते तो हमारा देश १९३० में ही आजाद हो गया होता । गाँधी जी भारत को आजाद देखना चाहते थे पर आजाद देखने और आजाद कराने में अंतर होता है । गाँधी जी के द्वारा चली जा रही लड़ाई में Down State की मांग की जा रही थी । इसका परिणाम ये होता कि हम स्वतंत्रता के नाम पर आजाद तो हो जाते पर ऊपर से हुकूमत करते अंग्रेज । भारत में पूर्ण स्वराज्य की मांग सबसे पहले भगत सिंह ने ही पेश की । जब 23 वर्ष के भगत सिंह शहीद हुए, उस वक्त गांधी जी की उम्र 62 वर्ष थी पर लोकप्रियता के मामले में भगत सिंह कहीं से कम नहीं थे । भगत सिंह की यह बढ़ती हुई लोकप्रियता कांग्रेस को एक ख़तरे की तरह दिखाई देती थी क्योंकि कांग्रेस को सुरुवात से ही केवल सत्ता ही चाहिए थी । १९१५ में जब गाँधी जी अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे , तब से वो सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत को आधी अधूरी आजादी दिलवाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे । पर वास्तविकता यही है कि भगत सिंह जैसा क्रांतिवीर अगर अपनी क्रान्ति लेकर नेशनल अस्सेम्ब्ली में न कूंदा होता तो गांधी जी की सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते चलते कमर टूट जाती पर देश को आजादी न मिल पाती । क्योंकि गांधी जी शांतिपूर्वक नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे थे जो अंग्रेज़ों के लिए काफ़ी अच्छा था, इससे उनकी व्यवस्था पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ता। भगत सिंह की फांसी के दौरान देश भर के लोगों और कांग्रेस की तरफ से गाँधी जी पर दवाब था कि गाँधी जी इरविन समझौते में फांसी न लगने कि शर्त रख दे जिससे निश्चित रूप से फांसी रूक जाती परन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया । गांधी ने इरविन समझौते में बातचीत के दौरान इरविन से केवल यह कहा था कि अगर इन युवकों की फाँसी माफ़ कर दी जाएगी तो इन्होंने मुझसे वादा किया है कि ये भविष्य में कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे । गांधी के इस कथन का भगत सिंह ने पूरी तरह से खंडन किया । असलियत तो यह थी कि भगत सिंह हर हाल में फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों । वो कतई नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता । वे यह भी जानते थे कि घंडी जी मार्ग पर चलकर आजादी नहीं मिल सकती । नाथूराम विनायक गोडसे के अनुसार गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप , झांसी की रानी व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। मेरे भगत के प्राण केवल उसकी माँ के लिए थे । भगत सिंह की फांसी जहाँ एक ओर ब्रिटिश हुकूमत और गाँधी की नैतिक हार में बदल गई । वहीं दूसरी ओर यह भगत सिंह और क्रांतिकारियों की नैतिक जीत भी बनी । देश भर में अब हजारो क्रांतिकारियों ने जनम ले लिया था , वो भी पूर्ण स्वराज्य का सपना लेकर जिसको पूरा करने का दम ख़म बब उनके पास आ चुका था और अंततः मेरे देश की आजादी का वक्त आ गया था । पर देश के आजाद होते होते गाँधी जी के मोहम्मद अली जिन्हा के बेफजूली के समर्थन से मेरे देश की माता का अंग छिन्न भिन्न हो गया । कितने ही हिन्दू मुसलमान जाति सम्प्रदाय के नाम पर बलि चढ़ गए । कई हिन्दुओं से जबरन धर्म परिवर्तन करा लिया गया ।
भारत तो आजाद हो गया पर दिल में मलाल रह गया कि काश भारत के यूँ टुकड़े न हुए होते ।
