आज का एक बड़ा दर्शक वर्ग बेहूदा कही जा सकने वाली खबरों में अपनी रूचि इस कदर दिखा रहा है की ऐसे लोगो को आसानी से मौका मिल गया है जो सनसनी के नाम पर कभी मसाले के नाम पर ऐसी खबरे छाप रहे है जिन्हें कभी पाठक देखना पसंद भी नहीं करता था
आज अगर भगत सिंह जैसे किसी वीर की पुण्यतिथि होती है तो लोग बमुश्किल ही जान पाते है मगर अमिताभ बच्चन के जन्मदिन के मौके पर सारा अखबार उनकी जीवनी से रंग जाता है, मगर इस सब में जितनी गलती उन लोगो की है जो ऐसी बे सर पैर की खबर छापते है उससे जादा गलती उनकी है जो ऐसी खबरे पढना चाहते है । निसंदेह ऐसी खबरे पत्रकारिता को तो कलंकित करती है बल्कि सामाज के मष्तिस्क और आत्मा पर बुरा प्रभाव डालती है ।

आखिर पत्रकारिता में यही कहा जाता है कि पाठक कि नजर से स्टोरी पढ़ें फिर उसी हिसाब से स्टोरी कवर करें ...
ReplyDeleteभाई,इन दोनों ने भी समाज में अपना एक मुक़ाम बनाया हैं.दरअसल लोगों के साथ भी दिक्कत हैं कि वे जानना चाहते हैं की शादी कैसी रही और आदि आदि.मीडिया केवल क्रांति या आंदोलन के मुद्दो पर काम नही कर सकता.मनोरंजन पर निर्भर रहना भी जरूरी हैं.आप सुधीर चौधरी की बात करते तब पत्रकारिता के स्तर के गिरने के बारे में समझ आता.यह जो किस्सा आप सुना रहें हैं ये तो अब चलन हैं.
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