जो दिखाया वो सचमुच में चक्रव्यू

RAFTAAR LIVE
0
गोविंद सुर्यवंशी और ना जाने कितने नाम हैं तुम लोगों के.. लेकिन बहुत समय से मैं तुम्हें खोज रहा था. अब चले.. इसी डायलॉग के साथ फिल्म चक्रव्यू का चक्र शुरू होता हैं.नक्सली कमांडर गोविंद पूलिस के हथ्ते लगने के बाद से "लाल सलाम" के हर नारे के साथ जल,जंगल,जमीन, की बात करने वाले काँमरेड आदिवासियों की जमीन के लिए लड़ने लगते हैं.फिल्म दो दोस्तों की विपरीत सोच से शुरू होती हुई एक राह पर दोस्ती के नाम पर दोनों को ला खड़ा कर देती हैं.अभय देवल जिन्होंने फिल्म में कबीर का किरदार अदा किया हैं वो नंदीघाट के नक्सलियों से ख़बरी के तौर पर अपने डीजीपी पूलिस अधिकारी अर्जून रामपाल यानी आदिल के लिए जुड़ते हैं.काफ़ी हद तक कमांडर राजन और उनके साथियों की कमर तोड़ भी देते हैं.भीतर ही उन्हीं के साथ रह कर घर का भेदी लंका ढाएं जैसा कुछ कर दिया जाता हैं.वही,महांता ग्रुप जिसके प्रमुख लंदन में एक आलिशान बंगले में रहते हैं और 15,000 करोड़ का निवेश अपनी कंपनी के माध्यम से नंदीघाट में करने का प्राँजेक्ट बनाते हैं तब तमाम पूंजीवादी सब गांव में रह रहें आदिवासियों को विकास के नाम पर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने की जी तोड़ कोशिश में लग जाते हैं.आदिल खान इसे ग़लत ठेहराते हुये तमाम ठेकेदारों को हवालात में डाल देते हैं.जो कुछ समय में गृह मंत्री के फोन से इस साहस के लिए फटकारें भी जाते हैं.इसी दौरान आदिल का गांव वालों में विस्वास पैदा करने का संकल्प ढीला होने लगता हैं.आदिल का मानना होता हैं कि बिना आदिवासियों के सहयोग के नकस्ली कुछ समय में ही विफल हो जाएंगे.वही,धीमे धीमे कबीर आदिल के साथ मिल कर पूलिस की हर मूवमेंट की जानकारी नक्सली कमांडरो तक पहुंचा कर उन पर भरोसा हासिल करने लगता हैं ..

लेकिन धीरे धीरे प्रकाश बंदूक,गोली से अपना हक़ लेकर रहेंगे कहने वाले नक्सलियों को ऐसे दर्दनाक ढंग से फिल्माते हैं कि दिल्ली की मेट्रो में घुमने वाला युवा भी सोचने पर मजबूर हो जाएं-क्या इन लोगों के साथ जो हुआ या हो रहा हैं वो सही हैं.?महिला काँमरेड(जूही)जो अपने घर की जमीन छीन जाने के कारण और उसी के चलते पिता की हत्या की रपट लिखवाने थाने जा कर एक रात के बदले रिपोर्ट लिखूंगा की घटियां और शर्मनाक बात सुन कर छत्तीसगढ़ से भाग मध्य प्रदेश जा कर नक्सल मूवमेंट से जुड़ती हैं तब तमाम संघर्ष के बाद दस साल जिंदा रहने पर 100 को खत्म कर डालने का दम भरती हैं.. दूसरी ओर इन बातों के प्रभाव से कबीर खूद से लड़ने लगता हैं.. उसकी लड़ाई किस चीज को लेकर हैं.?नक्सलियों से,पूलिस से,वो देश के खिलाफ़ हैं या देश के साथ,आखिर ये लोग ऐसा क्यूं कर रहें हैं इन चीजो से उसकी मुठभेड़ इतनी भयावह होने लगती हैं जब वो देखता हैं कि बिना किसी बातचीत के मेरी जानकारी पर नक्सली और तमाम गांव वालों पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गई उसका दिल उसे खूद कबीर को दोषी बताने लगता हैं.

यही से आदिल का दोस्त जो शुरूआत से ही भावुक रहा हैं वो आदिल से इन चीजो को लेकर अपना विरोध दर्ज करने लगता हैं.दोस्त आदिल से एक दोस्त की हैसियत से आखरी मुलाक़ात करते वक्त़ दो टूक कबीर कह देता हैं-गरीब को गरीब रखना,उसके अधिकारों से उसे वंछित रखना सबसे बड़ा आतंकवाद हैं.इसी सिलसिलेवार बदलाव के दौरान महिला काँमरेड जूही से भावुक रिश्ता जुड़ने के बाद जब एक दफ़ा पूलिस रेड के दौरान कबीर यह पाता हैं की जूही ने गांव के बच्चो और निर्दोष लोगों के लिए अपनी गिरफ्तारी दें दी.तब उसी समय भागते हुये अपने दो साथियों संग कबीर एक ऐसी दौड़ लगाता हैं जो शायद उसके रास्ते को बदल कर रख देने की शुरूआत होती हैं,उसके मकसद को बदलने की शुरूआत.जंगल चौकी में पेट्रोलिंग पूलिय इंस्पेकटर जूही के साथ जबर्दस्ती करता हैं और फटे कपड़ो में उसके मूंह से निकलती हर हवा के साथ यही अलफ़ाज निकलते हैं -"अपना हक़ लें कर रहेंगे" .. बाहर कबीर इंस्पेक्टर के आगे हो कर साथी जो इंस्पेक्टर पर बंदूक की नोक लगाते हैं पांच पूलिस अधिकारियों को मौत के घाट उतार कर भीतर घुस कर जूही को साथ लें जाता हैं.अगले दिन चौराहें पर पूलिस इंस्पेक्टर की लाश समेत खून से लिखा होता हैं-"तुम्हारें हर बर्बर अत्याचार का बदला इसी तरह देंगे" और कैमरा में प्रशासन व्यवस्था को लेकर फिर से सवालों का सिलसिला उठने लगता हैं.इसी दौरान कैसे राजन गिरफ्तार हुआ और आगे कैसे महांता ग्रुप के मालिक के बेटे को अगवा कर अपनी मांगे नक्सली मनवाने में काय़माब हुये..बेहद ही रोमांचक और हैरत अंगेज हैं क्योंकि जो प्रकाश झा ने जो दिखाया वो सचमुच में चक्रव्यू की भांति भीतर के अंतर्विरोधों से दर्शकों के सोचने का चक्र चालू कर चुका होता हैं.

लेखक-अंकित

संपर्क-https://www.facebook.com/ankit.mutreja.5

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)