यश जी का यूँ तो फिल्मो से जुड़ना एक संयोग था क्यूंकि वे लाहौर से मुंबई इनजीनियर बनने आये थे, 1956 में बी.आर. चोपड़ा (यश जी के बड़े भाई ) एक ही रास्ता फिल्म बना रहे थे तो उन्होंने यश जी को अपना असिस्टंट बनने को कहा और वहीँ से यश जी के फ़िल्मी सफ़र की शुरुवात हो गयी। यश जी ने जैसी फिल्मे समाज में प्रस्तुत की वे सभी एक ऐसी आदर्श के रूप में है जिन्हें आने वाली पीढ़ी देखकर ये जान सकती है की हिंदी फिल्म उद्योग के निर्माण में "यश चोपड़ा" का एक ऐसा योगदान रहा है, जैसे योगदान की कल्पना भी आने वाले समय में किसी से नही की जा सकती है ।
हाल ही में उन्होंने अपने रिटायरमेंट की घोषणा अपनी अगली आने वाली फिल्म "जब तक है जान" के बाद की सुनिश्चित कर ही दी थी, इस फिल्म के निर्माण का काम अभी कुछ बाकि ही था मगर उससे पहले ये महान निर्देशक इस संसार को छोड़ कर चला गया ।
