पैसा ही क्यूँ

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इंसान माँगता है जवाब ,
बड़े दुखः की है बात ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....
            
मरता है कोई क्यूँ बिना इलाज ,
अपनों से बड़ा हो गया स्वार्थ ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

ख़ुशियों का लगता है यहाँ बाज़ार ,
हर कोई बनना चाहता दुनिया का सरताज ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

संयुक्त परिवार का खत्म होता रिवाज़ ,
हम अपनों से ही नहीं रखते वास्ता आज ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

रहते थे दुखः में जो साथ – साथ ,
जलने लगे एक दूसरे के सुख से आज ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

खो रहे लोग इस दौड़ में हो कर अंजान ,
हो गया सुकून इस दौड़ में कुरबान ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

टूट रहे रिश्ते बिखर रहे संस्कार ,
खोते जा रहे हम अपनेपन की पहचान ,
पैसा ही क्यूँ सब कुछ है आज....

ऊपर से देख रहे अपने इंसानों को भगवान ,
रो रहे देख अपने बच्चों का ये हाल ,
सोचते बनाये थे फ़रिश्ते बन गये शैतान ,
पैसा ही जिनका ईमान , पैसा ही है जिनका भगवान...........



                                                                                                           लेखक- अंकुर सहाय 




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