दिल की बात दिल में ही क्यों रह जाती है .................. दिल की बात होठों तक क्यों नहीं आती है।
न शिकवा कर पाते हैं , न गिला कर पाते हैं, जब भी कोई बात मेरे दिल को तडपाती है .......... क्यों इन आँखों में सिर्फ नमी झिलमिलाती है, पर दिल की बात होठों तक क्यों नहीं आती है।
न प्यार जता सकते हैं, न शिकवा बता सकते हैं, न अपने दिल की बातों का, अहसास करा सकते हैं, हर बात की दिल में ही क्यों, कब्र बन जाती है ............... पर दिल की बात होठों तक क्यों नहीं आती है।
मेरे दिल में सिर्फ प्यार है, नजर में इन्तजार है, उसे दिल भर के प्यार करने को, मेरा दिल बेकरार है, क्यों इस बेपनाह प्यार में भी उन्हें कमी नजर आती है .................... क्या करूँ, दिल की बात होठों तक कभी नहीं आती है।