नियंत्रण रेखा पर एक भारतीय सैनिक का सर काटने और वहां संघर्ष विराम समझौता तोड़कर तनाव पैदा करने की पाक की नापाक कोशिशों का जनरल बिक्रम सिंह ने मुहतोड़ जवाब देने की चेतावनी दी है |इससे दोनों देशों के आपसी रिश्ते एक बार फिर तनाव के दौर में प्रवेश करते दिख रहे हैं ऐसे वक्त पर ,जब पाकिस्तान और भारत के बीच फिर से बहाल दोस्ताना बातचीत कुछ रंग दिखाने लगी थी ,पाकिस्तान की ओर से दो भारतीय सैनिकों को बेरहमी से मारने की कार्यवाही क्यों और किसने कार्यवाही ,यह किसी की समझ में नही आ रहा |डेढ़ दशक का इतिहास देखें तो पाक के रेवैये में वहीँ एक बात झलकती है |
आइये डालते है एक नजर ....
१९९९ में भारत से दोस्ती की पहल करने वाले नवाज शरीफ ने अटल बिहारी बाजपेयी का लाहौर में गर्मजोशी से स्वागत किया और इसके तीन महीने बाद पाक सेना ने कर में करगिल घुसपैठ कर दी |२००८ में जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री नई दिल्ली में मौजूद थे ,मुंबई पर पर २६/११ का आतंकवादी हमला हुआ |और अब ,जबकि दोनों देशों के क्रिकेट रिश्ते बहाल कर लिए ,वीजा व्यवस्था को उदार बनाने का समझौता किया और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने के लिए व्यापार की शर्ते उदार करनी शुरू कीं .पाकिस्तान ने यह घिनौना काम कर दिया ताकि नियंत्रण रेखा पर २००३ में हुआ संघर्ष विराम समझौता तोड़ने का बहाना मिले और जम्मू कश्मीर की ७४० किलोमीटर विभाजन रेखा पर चौबीस घंटे गोलाबारी चलती रहे |इन तीनो वारदातों में हाथ पाकिस्तान सेना का ही उजागर हुआ है और तीनों बार पाकिस्तान की जनतांत्रिक सरकार भारत के खिलाफ हुई घटनाओं से पल्ला झाड़ती रही है |
तालिबानी खेल
इस बार भी पाक सरकार कह रही है की वह संघर्ष विराम समझौता नही तोड़ना चाहती लेकिन विदेश मंत्री खार के बयानों के बावजूद नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी का सिलसिला चलता रहा | जबकि अपने को मजबूत पाते ही वह भारत के खिलाफ सक्रीय हो जाती है | १९९९ में जब काबुल में अमेरिकी अगुवाई वाली सवा लाख नाटो सेना ने अफगानिस्तान से लौटने की तैयारी में है है और वहां से सही –सलामत लौटने की तैयारी के लिए अमेरिकी पाकिस्तान की खुशामद कर रहा है , पाकिस्तान सेना ने फिर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है | २०१४ तक अफगानिस्तान से अमेरिकी फ़ौज के हटाने और वहां तालिबान के लौटने की संभावना से पाकिस्तान का मनोबल इतना बढ़ गया की वह तालिबान की मदद से जम्मू कश्मीर पर कब्जा करने का सपना देखने लगा है |इसलिए राजनयिक हलको में इस नजरिये से भी सोचा जा रहा है की पाकिस्तानी सेना का ताजा कदम क्या २०१४ की तैयारी है ?
शायद यही वजह है की रक्षा मंत्री एके एटोनी ने दो सैनिको को हत्या की वारदात को टर्निग प्वाइंट यानी एक ऐसा मोड़ कहा है जहाँ से पाकिस्तान के प्रति भारत का रवैया काफी बदला हुआ होगा |२००३ में नियंत्रण रेखा पर पूर्ण संघर्ष विराम समझौता करने के पीछे पाकिस्तान की मज़बूरी थी क्योंकि तालिबान को काबुल से हटाने के बाद पाकिस्तान से अमेरिका ने साफ़ कहा था की यदि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साथ नही दिया तो उसको पाषण युग में भेज दिया जाएगा |
डरा और कमजोर पाकिस्तान भारत के साथ भी रिश्ते सामान्य करने को मजबूर हुआ क्योकि उसकी आर्थिक हालत पूरी तरह खस्ता हो चुकी थी |लेकिन अब अफगानिस्तान से अमेरिका की विदाई के साथ पाकिस्तान को फिर लग रह है की कश्मीर पर तनाव बढाकर वह अपने मंसूबे पूरे कर सकता है |
(कुछ अंश नवभारत टाइम्स से)
