तुम
प्रकृति की गति को कुछ पल के लिए रोके खड़ी थी
वादियों में केसर की फसल ओढ़े धरती की माफिक
मैं तुम्हे छूना केवल इसलिए चाहता था
ताकी जान सकूं की तुम ख्वाब हो या हकीकत!!!!
शब्दों के अकाल से पीड़ित मैं भूल गया था
चीकू से शब्द, बातों के पुलिंदें
ग़ालिब के शेर,भावनाओं के पुल
सब कुछ भूल गया था मैं!!!!!
किसी जंगली कबीलाई गाँव में
जैसे बिजली का पहला बल्ब जला हो!
विष बुझे तीर से घायल की
संजीवनी की तरह आये तुम
देख नहीं पाया कुछ भी
देखते हुए भी सब कुछ
क्या तुम मुस्करा रही थी?????
या चाहती थी कुछ कहना?
केवल इसीलिए मैं तुम्हे देखना चाहता था
ताकी जान सकू की क्या तुम कुछ कहना चाहते थे???
प्रकृति की गति को कुछ पल के लिए रोके खड़ी थी
वादियों में केसर की फसल ओढ़े धरती की माफिक
मैं तुम्हे छूना केवल इसलिए चाहता था
ताकी जान सकूं की तुम ख्वाब हो या हकीकत!!!!
शब्दों के अकाल से पीड़ित मैं भूल गया था
चीकू से शब्द, बातों के पुलिंदें
ग़ालिब के शेर,भावनाओं के पुल
सब कुछ भूल गया था मैं!!!!!
किसी जंगली कबीलाई गाँव में
जैसे बिजली का पहला बल्ब जला हो!
विष बुझे तीर से घायल की
संजीवनी की तरह आये तुम
देख नहीं पाया कुछ भी
देखते हुए भी सब कुछ
क्या तुम मुस्करा रही थी?????
या चाहती थी कुछ कहना?
केवल इसीलिए मैं तुम्हे देखना चाहता था
ताकी जान सकू की क्या तुम कुछ कहना चाहते थे???
By
Avinash Pandey
