प्रकृति के प्राकृतिक क्षण ,
लगते हैं मुझको विलक्षण |
उसका अदभुद स्वरुप ,
है चेतन का प्रतिरूप |
प्रकृति का रम्य प्रातःकाल,
कोटि ह्रदयों का है रसाल |
प्रभात की कोयल का हर स्वर ,
मधुवाणी का है रत्नाकर |
प्रभात का रक्तोत्पल ,
है नयनों का उत्पल |
प्रभात की लालिमामय कांति ,
मन को दे रही है कौतूहल शांति |
प्रभात का रक्तक आब ,
जैसे सुंदरी का कौमार्य ख्वाब |
जरा जाग जाओ ,
ऊषा कह रही है |
प्रभात का सौंदर्य ,
कहीं लुट न जाय |
बहारों का मौसम ,
कहीं ढल न जाय |
By
Kuldeep Shukla
