मजबूरी या सज़ा

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एक हलचल उठी आज मन में
न जाने किस तूफ़ान का अंदेशा था वो
दिल धड़क उठा जब निगाहों ने देखा
कुछ दर्द बयां कर गयी दो मासूम आँखें वो

गहरायी तक जाना किसी ने समझा नहीं ज़रूरी
समस्या को सुलझाने का उठाया नहीं गया बीड़ा
तड़पती रही वो नन्ही सी जान
और वो बचपन जीने का सपना देता रहा पीड़ा

अनजान रह गए वो नए रंग बिरंगे खिलौनों से
किताबो की जगह कभी पत्थर तो कभी बर्तन ढ्होया
घूरती रही निगाहें बदलाव की राह को
पर घुटता रहा बचपन और सिर्फ काम का बीज बोया

किसने सोचा था की बचपन का ये भी रूप हो जायेगा
आँखों में चमक की जगह दुःख का सैलाब दिखाई देगा
इंसान तो बस यूँ तमाशा देखता रह गया
और ये मासूम बचपन बालश्रम की आग में झुलस गया...

लेखक-अनमोल तिवारी
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