सोने के परिंदे

RAFTAAR LIVE
0

ख्वाहिशों के बंधन से ,

मुक्त कौन हो सका है ?
जिस "परिंदे की आजादी" को ?
वो भी कुछ न कर सके |
उस "सोने के परिंदे " की आज़ादी 
एक मीठा भ्रम हे ये ,
स्वतंत्र हो कर भी क्या मिला ?
जब मन में लाखो तंत्र है .
एक मुठ्ठी आनाज की खातिर 
कोई फंसी पे चढ़ रहा ,
भूख से व्याकुल परिवार 
देखो कैसे मर रहा ...
और वे कहते हें कि..
देश तरक्की कर रहा ....
ऐसी तरक्की हमारे किस काम की 
जहाँ राजनीति खेली जाए 
नाम ले के श्री राम की ,

कवी - संजय कुमार गिरि
Tags

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)