फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के बेहद सुरीले और बेहतरीन संगीत निर्देशक सलिल चौधरी सिनेमा में भारतीय शास्त्रीय संगीत के ध्वजवाहकों में एक थे। लंबे समय तक इप्टा की सांस्कृतिक इकाई से जुड़े रहे सलिल दा की संगीत निर्देशक के तौर पर पहली बंगला फिल्म थी 1944 में बनी 'परिवर्तन' और पहली हिंदी फिल्म थी 1953 में बनी विमल राय की 'दो बीघा जमीन'। उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की पचास से ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया। शंकर जयकिशन, नौशाद, एस. डी. बर्मन, कल्याणजी आनंद जी, मदन मोहन, रोशन जैसे महान संगीतकारों के समय में भी सलिल दा अपनी अलग और गरिमापूर्ण उपस्थिति दर्ज़ करने में सफल रहे। उनकी कुछ महत्वपूर्ण हिंदी फ़िल्में थीं - जागते रहो, नौकरी, मधुमती, एक गांव की कहानी, विराज बहू, मुसाफिर, परख, माया, काबुलीवाला,, छाया, उसने कहा था, हाफ टिकट, मेरे अपने, आनंद, सारा आकाश, मृगया, सपने सुहाने, छोटी सी बात, रजनीगंधा, अनोखी रात, सबसे बड़ा सुख, अन्नदाता, प्रेम पत्र, हनीमून, चांद और सूरज, चारदीवारी, मेम दीदी, पूनम की रात और आनंद महल। सलिल दा के जन्मदिन पर हमारी भावभीनी श्रधांजलि, उनकी फिल्म ' एक गांव की कहानी ' के शैलेन्द्र के लिखे और तलत महमूद के गाए मेरे एक पसंदीदा गीत के साथ !
रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाए
रंग भरे सौ जाल बिछाए
आंख खुली तो सपने टूटे
रह गए गम के काले साएं
हमने तो चाहा भूल ही जाएं
वो अफ़साना क्यों दुहराएं
दिल रह रहके याद दिलाए
दिल में दिल का दर्द छुपाए
चलो जहां क़िस्मत ले जाए
दुनिया परायी लोग पराएं !
लेखक - ध्रुव गुप्ता
