इस दो रंग कि साड़ी मे,
तू मेरी आधी लगती है,
तो फिर तू आधी किसकी है ?
तू खुद कहती तू उसकी है,
पर खुद से तो पूछ किसकी है.
तेरी आँखों मे जो मस्ती है,
जैसे लहरों मे कोई कश्ती है.
तेरी आँखों का जो पानी है,
मेरे दर्द कि वो कहानी है.
इस दो रंग कि साड़ी मे,
तू मेरी आधी लगती है,
तो फिर तू आधी किसकी है ?
तेरी साड़ी का जो किनारा है,
तेरे आशिक का वो सहारा है.
तेरी साड़ी का जो गोटा है,
उसने न जाने कितने अरमानों को घोटा है.
फिर भी तू कहती रहती है,
तू आज भी पहले जैसी है.
इस दो रंग कि साड़ी मे,
तू मेरी आधी लगती है,
तो फिर तू आधी किसकी है ?
लेखक- वैभव सिन्हा
