हिंदुस्तान से हिंदी गायब !

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हमारे देश मे ऐसे कई मूल निवासी हैं जिनसे अगर ये पूछा जाए कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा क्या है तो उनका जवाब तो होगा हिन्दी लेकिन उन्हे गर्व होता है तब जब वो अँग्रेज़ी बोलना सीख लेते हैं भारत मे हिन्दी की कितनी दुर्दशा है इस बात से सभी वाखिफ़ हैं अँग्रेज़ी भाषा मे जकड़े आज हिन्दुस्तान के वासी सीना चौड़ा करके बोलते हैं "मुझे हिन्दी नही आती" हिन्दुस्तान की हिन्दी आज स्वयं ही अपना अस्तित्व खोती नज़र आ रही है अंग्रेज़ो की इतनी लंबी गुलामी हिन्दुस्तान यो आज़ाद हो गया पर भारत के पैर अँग्रेज़ी की जंजीरो से इतनी जोरो से जाकड़ गये कि आज हिन्दुस्तान मे हिन्दी का स्तर गिरता चला जा रहा हैकुछ लोग हिन्दी की वकालत तो करते नज़र आ जाते है पर असर कब ओर खा होता है ये पता कर पाना हमेशा मुश्किल रहा है 
गत वर्ष बाबा रामदेव उच्चशिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओ में कराने की माँग करते नज़र आए पर हुआ क्या और होगा क्या ये हर भारतीय जानता है आवाज़े उठती हैं और बंद हो जाती है और चिंतन का विषय चिंतन तक ही सिमट कर रह जाता है
वही दूसरी ओर मुंबई के उच्चतम न्यायालय ने ये फ़ैसला दिया था की लोक सेवा आयोग की अंतिम परीक्षा यानी साक्क्षात्कार में परीक्षार्थी अपनी मात्र भाषा में उत्तर दे सकता है पर शायद न्यायालय यह भूल गया कि उसका फ़ैसला परीक्षार्थी को सफल नहीं बना सकता क्योकि फ़ैसला केवल भाषा का माध्यम बदल सकता है कुर्सी पर बैठे परीक्षकों के विचार नही बदल सकता
यहाँ आवश्यकता सोच बदलने की है क्योकि कुर्सी पर बैठे परीक्षक अगर अँग्रेज़ी को ही श्रेष्ठ समझते रहे तो कोई भी फ़ैसला कोई बदलाव नही कर पायेगा
विडंबना यह है कि भारतवासी अपनी ही मात्रभाषा को वो सम्मान , वो इज़्ज़त नही दे पाता जो की वह अँग्रेज़ी भाषा को देता है मैने भारत मे शिक्षा के विकास से संबंधित किताब मे पढ़ा था कि भारत मे अँग्रेज़ी भाषा की नींव लॉर्ड मैकाले ने डाली थी उसका केना था कि "अगर मेरी भाषानीति भारत मे लागू हो गई तो हर एक भारतीय अपनी ही मात्रभाषा से घृणा करने लगेगा"
और आज शायद हम उसी दंश को झेल रहें हैं
 हालात यहाँ तक पहुँच चुके है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति आज अपने बच्चों को कुछ भी करके अँग्रेज़ी माध्यम के शानदार विद्यालय में पढ़ना चाहता है चाहे इसके लिए उन्हे कुछ भी झेलना पड़े
ग़लती इन अभिभावको की नही है आज की भड़ती हुई इस गला काट प्रतियोगिता की है जब जीविका के उद्देश्य से व्यक्ति किसी प्रतियोगी परीक्षा मे चयनित किया जाता है तो यह देखा जाता है कि बालक की पढ़ाई का माध्यम क्या है अँग्रेज़ी या हिन्दी  क्यो हर क्षेत्र में हिन्दी को ही इतनी दयनीय नज़रों से देखा जाता है लोग क्यो भूल जाते हैं कि हमारी इन्ही मूल भाषाओं (हिन्दी व संस्कृत) ने ऋषियों, योगियों, मुनियों को जन्म दिया और ना जाने कितने वेद कितने पुराण शास्त्र उपनिषद् ग्रंथ की रचना की
जब हर भारतीय दुनिया के संपूर्ण साहित्य में सबसे ज़्यादा बलवान भारतीय वेद कितने पुराण शास्त्र उपनिषद् ग्रंथ को माना जानता है तो क्यों वह हिन्दी को श्रेष्ठ नहीं मानता
धिक्कार तो इस बात पर है की जिस देश की रास्ट्रभाषा हिन्दी है उस देश के सभी राजकीय तथा राष्ट्रीय कार्य अँग्रेज़ी भाषा मे किए जाते हैं नेता हिन्दी भाषण नही देते सरकारी दफ़्तरों मे जो आवेदन पत्र हिन्दी भाषा मे लिखे जाते हैं उन्हे मेज के ऊपर सजाया जाता है और जो आवेदन पत्र हिन्दी भाषा मे प्रस्तुत किए जाते हैं उन्हे कचरे के डिब्बे मे डाल दिया जाता है
विश्‍व भर के कितने ही देश फ्रांस, इटली, जर्मनी, और ना जाने कितने ही देशों ने कभी भी विकास करने के लिए विदेशी भाशों को अपनी शिक्षा का माध्यम नही बनाया और ना ही किसी भाषा को इतनी एहमियत दी फिर क्यों भारत मे आज़ादी इतने वर्ष बाद भी अँग्रेज़ी की दासता को नही छोड़ा भारत अंग्रेज़ो से तो आज़ाद हो गया परंतु जानबूझकर उनकी भाषा में जकड़ा हुआ है
क्यों भारतवासी ये नही समझते कि-
"निज भाषा उन्नति अहैं, सब उन्नति को मूल,   बिन निज भाषा के मिटे ना हिय को शूल"
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