कुछ मानसिक बीमार पुरुष

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एक बार फिर से पुरुष समाज को शर्मिदा होने की जरूरत है क्यूंकि कुछ पुरुषों की वजह से सम्पूर्ण पुरुष समाज का सर तब झुक जाता है जब कुछ मानसिक बीमार पुरुष अपनी हवस को मिटाने के लिए रात का अँधेरा हो या फिर दिन का उजाला इस ताक में घुमा करते हैं की  कब वह अपनी भूख को शांत करें और अकेली सुनसान गलियों और सड़कों में कमजोर महिलायों  ,बच्चियों , और युवतियों को पाकर उनका जबरन यौन शोषण करते हैं उनकी यह बीमारी लाइलाज है जो कैंसर की तरह है , जो उनके साथ ही समाप्त होती है|
बहस तो इस बात की है इन वहशी दरिंदों को फांसी की सजा होनी चाहिए या  नही| कई लोगों का कहना की उस व्यक्ति को जीने का अधिकार नही है जो दुसरे की जिन्दगी को नरक से बत्तर बना देते है और पीडिता जिन्दगी भर घुट –घुट कर जीती है, नही तो आवेश में आकर आत्मदाह कर लेती है  मगर  दोषी न्यायलय द्वरा सबूतों के आधार पर  दोषी पाया जाता है तो उसे उम्र कैद की सजा होती है फिर कई सारी कवादयों के बाद उसकी  सजा को कम कर दिया जाता है तो प्रशन यह उठा है क्या वाकई में उस पीडिता के साथ न्याय हुआ ,नही ! न्याय नही बल्कि उसके साथ खिलवाड़ हुआ उसकी जिन्दगी का बहुमूल्य आभूषण सरेआम इलाम हो गया और  दोषी आजाद होकर फिर किसी की जिन्दगी को इलाम करने को तैयार है  साथ में कई और ऐसे मानसिक बीमार तैयार हो जाते हैं जो उसके कृत्य में साथ देते है या फिर वह खुद यह सोचकर बल लेते है की उनसे बलत्कार किया था तो उसे मात्र इतनी ही सजा मिली थी , वो भी जब पकड़ा गया तब  हम  पकडे ही नही जायेंगे तो फिर काहे की सजा | अब भारतीय कानून पर भी सवालिया निशान उठने लगे है की दोषियों की कम सजा, कहीं जुर्म को बढ़ावा तो नही| अब क्या वाकई में भारतीय संविधान में संशोधन की जरूरत है? हाँ! जरूरत है, उन तमाम ऐसे कानूनों में बदलाव की जो वाकई में दोषियों को मानसिक रूप  बल दे रहे हैं |  
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1Comments
  1. दिल्ली कूच करो....................
    महाबेशार्मी की बात है, दिल्ली की बस में कुछ सरफिरो ने एक लड़की के साथ बलात्कार किया किन्तु राष्टपति के आदेश से राष्ट्रपति भवन के सामने हजारो लडकियों के साथ नीचता की जा रही है। इस नीचता की निंदा करने के लिए मेरे पास शव्द नहीं है ............................. क्योकि मै स्वयं राष्ट्रपति भवन के सामने यह नीचता मै देख के आ रहा हूँ ..........
    http://aagekiyatra.blogspot.in/2012/12/blog-post_22.html

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