'अर्चना' उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक गरीब परिवार में पैदा हुई,पिता खेती करते थे,मां घर संभालती थी,और भाई स्कूल जाता था.
घर के पास का ही एक लड़का तकरीबन चार साल से अर्चना को परेशान करता रहता था, पर अर्चना ने इस आने वालें खूंखार कल को महसूस न किया और एक दिन...
अर्चना की एक ना,सिर्फ एक ना थी,जिसने ज़िंदगी को एक ऐसा मोड़ दें दिया-
जिसके बाद दिल से आवाज़ निकली तो बस इतनी कि काश उस ना कहने के बाद हुई घटना को वक़्त के पन्नो से मिटा दिया जाए..काश ...
हम आप को उस समाज के बारे में बार-बार क्या बताएं.. जिसकी नज़र में पुरूष नही स्त्री ही दोषी हैं.ज़रूर उसी ने कुछ ऐसा किया होगा जिसके चलते लड़के को यह सब करना पड़ा.जी,हां अर्चना के रिश्तेदारों,गाँव,समाज से भी उसें यही प्रतिक्रिया मिली जिसकी आशा थी.
अब अर्चना की इस कहानी से कहानी के बाकी किरदारों की ज़िंदगी में कैसा तूफ़ान आया वो इसी से समझा जा सकता हैं कि दसवी में पढ़ने वालें उनके भाई को भी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी,पिता मानसिक तौर पर इस हद तक टूट चुके हैं कि नवंबर के उस दिन को लेकर उनसे बात करे तो इस शर्त पर कि फिर से उनके जख़्म कुछ यूं तरोताज़ा हो उठते हैं जिसके लिए उन्हें भी दिमागी अस्पताल जाना पड़ता हैं.मां को अर्चना बचपन से ही दवा की गोलियां खाते देखती आ रही हैं.ऐसे परिवार पर क्या आर्थिक और सामाजिक दबाव बनता होगा समझा जा सकता हैं.लेकिन,अर्चना की कहानी इतनी ही पेचीदा और साफ़ होती तो ही काफ़ी थी.कम से कम जब वो अपराधी नही तो ये दिन जो उसें देखना पड़ रहा हैं वो न देखती.और अपराधी होती भी तो.. पर हम आपको बता दें जिस लड़के ने अर्चना के मुंह पर तेज़ाब फेंका उसने वही मौका-ए-वारदात पर ज़हर खा लिया.लड़के को अपनी दीदी और जीजा जी की छत के नीचे ही सर छुपाने की जगह मिली थी वरना मां और पिता का साया उसके सर पर भी नही था.अर्चना पर जब तेज़ाब फेंका गया तब स्थिति इतनी भयावह और दर्दनाक थी कि आस-पास के अस्पताल में उनका प्राथमिक इलाज मुमकिन नही था.उनका चेहरा पूरी तरह से गल चुका था,मुंह फर फेंका गया तेज़ाब कपड़ो को धीरे-धीरे जलाकर लगभग-लगभग पूरे शरीर पर फैल गया था.अर्चना के हाथ और पैर भी जल चुके थे,साथ-साथ बायी आँख भी तेज़ाब की चपेट में आ चुकी थी.जब डाँक्टरो ने अर्चना को सफदरजंग अस्पताल के लिए रेफर किया तब से अब तक उनकी कुल 23 सर्जरी हो चुकी हैं.और आज भी अंदाजन 50 फीसद चेहरा उसी जख़्म को लिए नासूर बने बैठा हैं.
समाज की कोई बुराई समाज में रहने वालें इंसान के साथ जब इस तरह का शर्मनाक,निंदनीय,अपमानजनक,कुकृ
जब तक हम आप को बतातें हैं कि अर्चना आज एक आत्मविश्वास से भरपूर लड़की हैं.. वो खूब हंसती हैं.. और आर्थिक रूप से पूरी तरह कमज़ोर,इलाज करवाने में सक्षम न होने के बावजूद कहती हैं कि उस समाज से क्यों माँगू जो जख़्म पर महरम नही नमक लगाने का काम करता हैं.वो चाहती हैं कि आगे ऐसे ही प्रताड़ित और उत्पीड़न झेल चुकी महिलाओं के लिए वो कुछ अच्छा काम करें.. फैसला हमारा हैं.. क्या हम अर्चना को इस इक्कीसवी सदी के भारत से कदमताल करते देखना चाहते हैं|
लेख - अंकित मुटरिजा
