आज मुझे ये कहावत बिल्कुल
सही जान पड़ रही है कि “दिया तले ही अँधेरा होता है”, पता नहीं हम इधर-उधर क्यों
भटक रहे हैं जब “भारत रत्न” की असली दावेदार हमे इतनी आसानी से मिल सकती है |
बेचारी “बकरी” जो न जाने कब से मे-मे की रट लगाती रहती है उसे हम क्यों नज़रअंदाज़
कर रहे है, मेरे ख्याल से अगर वो मे-मे की इतनी रट लगा रही है तो वो इसके काबिल भी
तो है आखिर उसके दूध से 36 प्रकार के रोग भी तो मरते हैं न, बड़े ही दुर्भाग्य की बात
है कि समाज और देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली “बकरी” के बारे मे
आज कोई सोचने वाला ही नहीं है, बस कुछ घास-फूस और पत्तियों के बदले उससे सारा दूध
ले लिया जाता है और उसे उसके हिस्से का सम्मान भी नहीं दिया जाता है | हाल ही मे डेंगू
की बिमारी मे लोगों को जब “छटी का दूध” याद आया तो “बकरी का दूध” भी याद आ गया था
|
ऐसे मौके पर जब किसी नेता,
अभिनेता, फिल्मकार, वैज्ञानिक और खिलाड़ी आदि को लेकर सर्वसम्मती नहीं बन पा रही है
तो मेरे विचार से “बकरी” एक बेहतरीन विकल्प हो सकती हैं, जिन पर किसी भी तरह के
भ्रष्टाचार, खराब प्रदर्शन, असफल प्रयोग या अश्लील प्रदर्शन का अरोप नहीं लगा है |
बेचारी बकरी शुरुवात से ही
अपने सम्मान के लिए लड़ती चली आ रही है और उसका ये विरोध भी जायज़ है कि अगर “गाय
माता” है तो कम से कम उसे “बहन” का दर्ज़ा तो मिले, खैर अब बकरी कब तक मे-मे करती
रहेगी, समय आ गया है जब हमे उसके लिए कुछ करना चाहिए | यही सही समय है “भारत रत्न”
मिलने का सीजन चल रहा है दावेदारों की चर्चाएँ जोरो पर हैं, हमे “बकरी बहन” का नाम
रेकेमेंड कर देना चाहिए |
लेखक- वैभव सिन्हा
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