नया पता मतलब नयी सोंच

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हमारे समाज मे विभिन्न प्रकार के लोग हैं और जाहिर है विभिन्न प्रकार के लोगों कि सोंच मे भी विभिन्नता होगी, जिसका असर उनके जीवन कि हर विचारधारा पर पड़ता है, तभी तो जहाँ कुछ लोग एक ओर सिनेमा को मात्र मनोरंजन का जरिया मानते हैं वहीँ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिनेमा को जानकारी और जागरूकता का अभिन्न हथियार समझते हैं और इसी सोंच के साथ आगे आकार एक शिक्षाप्रद तथा संवेदनशील विषय को समाज के सामने लाने कि कोशिश “पवन के श्रीवास्तव” भी कर रहे हैं |

“पवन श्रीवास्तव” दर्शकों के सामने जल्द ही अपनी फिल्म “नया पता” को लाने वाले हैं जो कि “पलायन”(माइग्रेशन) के विषय पर आधारित है, पवन ने अपनी फिल्म के माध्यम से दिखाना चाहा है कि किस तरह रोज़ी-रोटी के कारण आम आदमी अपने जन्मभूमी और कर्मभूमि को अलग-अलग कर देता है और जब वो अपनी जन्मभूमी पर वापस लौटता है तो कितना कुछ बदल चूका होता है जिससे वो खुद को जुदा-जुदा सा महसूस करता है | जहाँ “नया पता” पलायन को एक सवाल की तरह उठाती है वही इसकी कहानी मे कही-न-कहीं इसका हल भी छुपा है जो हमे सोचने पर मजबूर भी करता है कि हमारे फैसले पलायन को लेकर कितने सही और कितने गलत होते हैं |


जितना खास इस फिल्म का विषय है उतना ही खास है इस फिल्म के बनने कि प्रक्रिया भी रही है नया पता उन कुछ चुनिंदा फिल्मो मे से एक है जो “क्राउड फंडिंग”( क्राउड फंडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे फिल्म निर्माता लोगो से अपने स्तर पर पैसों कि मादा के लिए आग्रह करता है) द्वारा बनी हैं, फिल्म मे काम करने वाले कलाकारों ने कोई मेहेंताना नहीं लिया है और उन्हें उम्मीद है ये फिल्म लोगो तक अपनी बात जरुर पंहुचा पाएगी |

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